Sunday, 20 April 2014

राशन पुण्‍य कमा रहा है

अगली कतार में खड़ा वो बच्‍चा
आखिरी ग्राहक बना रह गया
उसके हिस्‍से का राशन तो पहले ही
मंदिर के भंडारे में चढ़ गया...

कह दिया मां से जाकर उसने
बांध ले आज पेट से जोर की पट्टी
गेहूं चावल चीनी तेल में उसका हिस्‍सा
भाग्‍यवान हो गया है ... क्‍योंकि-वो
मंदिर के भंडारे में चढ़ गया है...

भूखा रहकर भी खुश है वो
कि उसका राशन पुण्‍य कमा रहा
भंडारे की जूठन से आती खुश्‍बू से
मां-बेटे दोनों भर लेंगे अपना पेट
ये जूठन नहीं उसका अपना है राशन
भक्‍तों के कमाये पुण्‍यों में भीगा
मंदिर के पिछवाड़े की जूठन से तृप्‍त
जो कि मंदिर के भंडारे में चढ़ गया है...

चल रहा अविराम अनवरत ऐसे ही
सदियों से राशन की कतारों का खेला
बनाता जा रहा अनेक दासों का रेला
अब दुकानों पर राशन नहीं ,पुण्‍य बिक रहे
पत्‍थर को लगते भोग और दास रो रहे

जूठन में आनंद, दुत्‍कारे जाने का परमानंद
उसकी खीसों में रम गया है ऐसे... जैसे कि
मंदिर से फेंका गया पकापकाया पुण्‍य
 उसके पुरखों तक को तृप्‍त कर रहा हो जैसे-
और क्‍यों रोये चीखे खिसियाये अपने पुरखों की भांति
आत्‍मसम्‍मान से  भूख नहीं मिटती
एक आत्‍मसम्‍मान ही तो है, जिसे कांख में दबाकर,
देख रहा है वह कर रहा अट्टहास...
देखो जिंदा मरते गये पुरखो तुम भी कि-
तुम्‍हारा हिस्‍से का राशन भ्‍ाी कर रहा पत्‍थरों पर  शासन,
खुश हो जाओ, तृप्‍त हो जाओ...कि 
वह मंदिर में चढ़कर पुण्‍य कमा रहा है।

- अलकनंदा सिंह

होली के रंग में दीवाली

रंग भी उधार के..उमंग भी उधार की...
होली भी उधार की, खुशी भी उधार की...
उतरनों में लिपटी लड़की
हतप्रभ सी खड़ी,
देख रही थी..तमाशा  आज कि-
उस पर क्‍यों लुटाई जा रही है
ममता भी उधार की...

कोई गाल छूता रंग से
कोई लगा रहा गुलाल तन पै
गोद में बिठाकर कमबख्‍़तों ने
होली के बहाने उसे...?
तोल लिया नज़रों से...
लगा लिया मोल धन से...

ऐसे थे रंग बिखरे समाजसेवियों के
अनाथालय की कृपापात्रों पर
खेलकर होली बच्‍चियों से , कर लिया
इंतज़ाम अपनी दीवाली मनाने का उन्‍होंने।

- अलकनंदा सिंह

Monday, 14 April 2014

अतीत

वे सबदिन पता नहीं... कहां चले गये?
कितने ही प्रिय नाम ,चेहरे और कदम
और पलछिन अपने साथ ले गये
कौन ला पाया आजतक उन्‍हें वापस
फिर भी...
अतीत  तो अतीत  होता है
वर्तमान बनना उसे नहीं आता
वह तो बस जमा कर सकता है
अपनी उन सब स्‍मृतियों को
जो उसे अहसास दिलातीं हैं
होने का..रचने का..बसने का
और धीमे से हर शय में घुलते जाने का


- अलकनंदा सिंह

Wednesday, 2 April 2014

शेष-बिंदु

यह चक्रवृत्‍त सी है एक पहेली कि
पहले आदमी बना या इंसान
शून्‍य की ही भांति एकटक
समय हमें घूर रहा है निरंतर ,
पूछ रहा है वह कि- शून्‍य, जो है पूर्ण,
वह कैसे रह पाया है पूर्ण
यही शून्‍यता है उसकी
कि शून्‍य में से शून्‍य के जाने पर भी
उसका शून्‍य ही बना रह जाना

अरे! यह ब्रह्म ही तो है
जो पूर्ण है - अकाट्य है,
जो अनादि है- अनंत भी ,
रेखा- त्रिभुज- चतुर्भुज के अनेक कोणों से मुक्‍त
इसी वृत्‍त- में समाये ब्रह्म- ब्रह्मांड में से,
खोजना है वह शेष-बिंदु अभी , कि जहां से
शुरू होता है इस धरती पर-
आदमी का इंसान में और
इंसान का आदमी में बदलते जाना।

- अलकनंदा सिंह
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